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June 26, 2024
ସ୍ଵାୟଂଭୁଵୋ ମନୁରଥୋ ଜନସର୍ଗଶୀଲୋଦୃଷ୍ଟ୍ଵା ମହୀମସମୟେ ସଲିଲେ ନିମଗ୍ନାମ୍ ।ସ୍ରଷ୍ଟାରମାପ ଶରଣଂ ଭଵଦଂଘ୍ରିସେଵା-ତୁଷ୍ଟାଶୟଂ ମୁନିଜନୈଃ ସହ ସତ୍ୟଲୋକେ ॥1॥ କଷ୍ଟଂ ପ୍ରଜାଃ ସୃଜତି ମୟ୍ୟଵନିର୍ନିମଗ୍ନାସ୍ଥାନଂ ସରୋଜଭଵ କଲ୍ପୟ ତତ୍ ପ୍ରଜାନାମ୍ ।ଇତ୍ୟେଵମେଷ କଥିତୋ ମନୁନା ସ୍ଵୟଂଭୂଃ...
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June 26, 2024
भज गोविन्दं भज गोविन्दंगोविन्दं भज मूढमते ।सम्प्राप्ते सन्निहिते कालेनहि नहि रक्षति डुकृङ्करणे ॥ 1 ॥ मूढ जहीहि धनागमतृष्णांकुरु सद्बुद्धिं मनसि वितृष्णाम् ।यल्लभसे निजकर्मोपात्तंवित्तं तेन विनोदय...
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June 26, 2024
𑌭𑌜 𑌗𑍋𑌵𑌿𑌂𑌦𑌂 𑌭𑌜 𑌗𑍋𑌵𑌿𑌂𑌦𑌂𑌗𑍋𑌵𑌿𑌂𑌦𑌂 𑌭𑌜 𑌮𑍂𑌢𑌮𑌤𑍇 ।𑌸𑌂𑌪𑍍𑌰𑌾𑌪𑍍𑌤𑍇 𑌸𑌨𑍍𑌨𑌿𑌹𑌿𑌤𑍇 𑌕𑌾𑌲𑍇𑌨𑌹𑌿 𑌨𑌹𑌿 𑌰𑌕𑍍𑌷𑌤𑌿 𑌡𑍁𑌕𑍃𑌂𑌕𑌰𑌣𑍇 ॥ 1 ॥ 𑌮𑍂𑌢 𑌜𑌹𑍀𑌹𑌿 𑌧𑌨𑌾𑌗𑌮𑌤𑍃𑌷𑍍𑌣𑌾𑌂𑌕𑍁𑌰𑍁 𑌸𑌦𑍍𑌬𑍁𑌦𑍍𑌧𑌿𑌂 𑌮𑌨𑌸𑌿 𑌵𑌿𑌤𑍃𑌷𑍍𑌣𑌾𑌮𑍍 ।𑌯𑌲𑍍𑌲𑌭𑌸𑍇 𑌨𑌿𑌜𑌕𑌰𑍍𑌮𑍋𑌪𑌾𑌤𑍍𑌤𑌂𑌵𑌿𑌤𑍍𑌤𑌂 𑌤𑍇𑌨 𑌵𑌿𑌨𑍋𑌦𑌯...
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June 26, 2024
स्वायम्भुवो मनुरथो जनसर्गशीलोदृष्ट्वा महीमसमये सलिले निमग्नाम् ।स्रष्टारमाप शरणं भवदङ्घ्रिसेवा-तुष्टाशयं मुनिजनैः सह सत्यलोके ॥1॥ कष्टं प्रजाः सृजति मय्यवनिर्निमग्नास्थानं सरोजभव कल्पय तत् प्रजानाम् ।इत्येवमेष कथितो मनुना स्वयम्भूः...
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भज गोविंदं भज गोविंदंगोविंदं भज मूढमते ।संप्राप्ते सन्निहिते कालेनहि नहि रक्षति डुकृंकरणे ॥ 1 ॥ मूढ जहीहि धनागमतृष्णांकुरु सद्बुद्धिं मनसि वितृष्णाम् ।यल्लभसे निजकर्मोपात्तंवित्तं तेन विनोदय...
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भज गोविन्दं भज गोविन्दंगोविन्दं भज मूढमते ।सम्प्राप्ते सन्निहिते कालेनहि नहि रक्षति डुकृङ्करणे ॥ 1 ॥ मूढ जहीहि धनागमतृष्णांकुरु सद्बुद्धिं मनसि वितृष्णाम् ।यल्लभसे निजकर्मोपात्तंवित्तं तेन विनोदय...
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भज गोविंदं भज गोविंदंगोविंदं भज मूढमते ।संप्राप्ते सन्निहिते कालेनहि नहि रक्षति डुकृंकरणे ॥ 1 ॥ मूढ जहीहि धनागमतृष्णांकुरु सद्बुद्धिं मनसि वितृष्णाम् ।यल्लभसे निजकर्मोपात्तंवित्तं तेन विनोदय...
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स्वायंभुवो मनुरथो जनसर्गशीलोदृष्ट्वा महीमसमये सलिले निमग्नाम् ।स्रष्टारमाप शरणं भवदंघ्रिसेवा-तुष्टाशयं मुनिजनैः सह सत्यलोके ॥1॥ कष्टं प्रजाः सृजति मय्यवनिर्निमग्नास्थानं सरोजभव कल्पय तत् प्रजानाम् ।इत्येवमेष कथितो मनुना स्वयंभूः...
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June 26, 2024
பஜ⁴ கோ³வின்த³ம் பஜ⁴ கோ³வின்த³ம்கோ³வின்த³ம் பஜ⁴ மூட⁴மதே ।ஸம்ப்ராப்தே ஸன்னிஹிதே காலேநஹி நஹி ரக்ஷதி டு³க்ருங்கரணே ॥ 1 ॥ மூட⁴ ஜஹீஹி த⁴னாக³மத்ருஷ்ணாம்குரு ஸத்³பு³த்³தி⁴ம் மனஸி வித்ருஷ்ணாம் ।யல்லப⁴ஸே நிஜகர்மோபாத்தம்வித்தம் தேன வினோத³ய...
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June 26, 2024
स्वायम्भुवो मनुरथो जनसर्गशीलोदृष्ट्वा महीमसमये सलिले निमग्नाम् ।स्रष्टारमाप शरणं भवदङ्घ्रिसेवा-तुष्टाशयं मुनिजनैः सह सत्यलोके ॥1॥ कष्टं प्रजाः सृजति मय्यवनिर्निमग्नास्थानं सरोजभव कल्पय तत् प्रजानाम् ।इत्येवमेष कथितो मनुना स्वयम्भूः...
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